Publish Date: Tue, 30 Dec 2025 10:25 AM (IST)
जमशेदपुर। जमशेदपुर के करनडीह स्थित जाहेरथान परिसर में सोमवार को आयोजित ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शामिल हुईं। कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने जाहेरथान में पूजा-अर्चना कर की। इस अवसर पर झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद रहे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में संताली साहित्यकारों और लेखकों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि आदिवासी समाज के स्वाभिमान, अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा में संताल राइटर्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा कि ओलचिकी उत्थान के लिए लोग अपने दैनिक जीवन से समय निकालकर निरंतर कार्य कर रहे हैं और पंडित रघुनाथ मुर्मू के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज भी समाज के सभी लोग अपेक्षित स्तर तक शिक्षित नहीं हो पाए हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि संविधान, कानून और प्रशासनिक जानकारी लोगों को उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध हो। उन्होंने कहा, “आज मैं जिस मुकाम पर हूं, उसमें अपने समाज के लोगों का प्रेम और बुजुर्गों का आशीर्वाद शामिल है।”
उन्होंने यह भी कहा कि उनका कर्तव्य है कि वे अपने समाज और ओलचिकी लिपि के संरक्षण व विकास के लिए कार्य करती रहें। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत सहित विश्व के कई हिस्सों में संताल समाज निवास करता है, इसलिए भाषा और संस्कृति को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रपति ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष पर संविधान का संताली (ओलचिकी) अनुवाद प्रकाशित किया गया, जो संताल समाज को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि संताली भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसलिए लोगों को देश के नियम-कानून और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी भी संताली में मिलनी चाहिए, ताकि अज्ञानता के कारण कोई निर्दोष जेल न जाए।
उन्होंने कहा कि देश के बड़े महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक संताल समाज के लोग रह रहे हैं। आदिवासी समुदाय में स्नातकों की संख्या अधिक है और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए। ओलचिकी संताल समाज की मजबूत पहचान है, जिससे समाज में एकता और जागरूकता बढ़ रही है। यह आयोजन भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति ने कोल जी की भाषा को समृद्ध बनाने में टाटा समूह की भूमिका की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि लंबे संघर्ष के बाद ओलचिकी भाषा को मान्यता मिली और अब इसे और सशक्त बनाने के लिए समाज के हर व्यक्ति को प्रयास करना होगा।
समारोह के अंत में विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संताल समाज के लोग, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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